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शक्ति का प्रागट्य | Shakti Ka Pragatya

शिवजी का धनुष जब जनकजी को देने में आया तब मुख्य स्थान पर रखने के लिए कई हाथियों द्वारा खींचवाना पडा था। यह पौराणिक घटना है।
जनक राजा रोज धनुष की पूजा करते थे। जनकजी ने सीता से कहा, “बेटी, मैं धनुष की पजा करूँ इससे पहले तुम गाय के गोबर से उसके आस-पास की भूमि को पवित्र कर देना।”
“अच्छा पिताजी।”
जानकीजी रोज गाय का गोबर लेकर धनुष के आस-पास पोतती है। स्थान पवित्र करती, तब जनकजी पूजा करते थे।
एक दिन सीताजी को हुआ कि में धनुष के आस-पास रोज गोबर लगाती हूँ, पर धनुष के नीचे की भूमि तो ऐसी ही रहती है। आज नीचे भी पोत दूँ। इस तरह सोच के सीताजी ने बायें हाथ से धनुष्य को ऊपर किया और दायें हाथ नीचे गोबर पोत दिया। फिर धनुष नीचे रखकर जानकीजी चली गयीं।
थोडी देर बाद जनकजी पूजा करने आये तो उन्हें परम आश्चर्य हुआ। धनुष के नीचे किसने पोत दिया? उन्होंने सीताजी को बुलाया और पूछा, “बेटी, धनुष के नीचे गोबर किसने पोता है?”
“पिताजी, मैंने पोता है। रोज आसपास पोतती थी, पर इससे नीचे कूड़ा रह जाता था। मुझे लगा कि नीचे भी पोत दूँ।”
जनक राजा चकित हो गये। सोचने लगे यह धनुष उठाया कैसे? पोता कैसे?
“बेटी! यह धनुष किसने उठाया?”
“मैंने।”
“तूने कैसे उठाया?” जनकजी की आवाज आश्चर्यमिश्रित बन गई।
“इस प्रकार।” कहकर सीताजी ने धनुष उठाया और फिर रख दिया।
उस समय जनकजी को पहली बार ख्याल आया कि जगत में शक्ति का प्राकटच हो चुका है।

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