Devkatha

किसको प्रणाम करे ? | Kisko Pranam Kare?

गोविन्दसिंहजी को लगा कि अब जीने का कोई अर्थ नहीं है। मेरी नजरों के सामने मेरे दो पुत्र, माँ चल बसे। गुरु ने अपना वसियतनामा लिखाँ। उसमें लिखा था कि मेरे पिताजी, मेरे बालकों ने कुर्बानी दी। मेरी माँ झरोखे से गिर पडी। इतनी कुर्बानी हुई। मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरी मृत्य के बाद मेरे शिष्य समुदाय मेरी समाधि न बनायें। उन्होंने यह भी कहाँ कि कुर्बान इसलिए कुर्बान। उसका कोई प्रतीक नहीं होता।
गोविन्दसिंहजी को पता था कि यदि मैं मना करुँगा तो शिष्य प्रेमवश मेरे मृत्यु के बाद समाधि बनायेंगे, इसलिए उन्होंने कठोर सूचना दी कि मेरे मृत्यु के बाद समाधि बनाने वाले शिष्य का वंश नहीं रहेगा।
पर एक शिष्य ऐसा निकला, जिसका नाम रणजीतसिंह था। उसकी आँखो से आँसू बहने लगे। उसने निश्चय किया कि मेरा वंश न रहे यह मुझे स्वीकार है पर मैं गुरुजी की समाधि बनाऊँगा। लाहौर के उस मालिक ने गुरु गोविन्दसिंहजी की समाधि बनाई। अपने वंश को त्याग दिया।
मेरी समाधि मत बनाना कहने वाले गुरु को प्रणाम करे या वंश त्याग करके गुरु का स्मारक बनाने वाले शिष्य को प्रणाम करे यह निश्चित नहीं हो सका।

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