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यज्ञ की पूर्णाहुति । Yagh Ki Purnahuti

महाराज युधिष्ठिर ने एक बार यज्ञ किया। यज्ञ में अन्तिम आहुति अर्पण की तो घंटे की आवाज नहीं हुई। अतः धर्मराज युधिष्ठिर को चिन्ता हुई। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा,”प्रभु! घंटे की आवाज क्यो नहीं हुई ?”
श्रीकृष्ण ने कहा, “कोई भूखा रह गया है। यज्ञ में किसी का अनादर नहीं हो सके, किसी का अपमान न हो सके। जब तक उस भूखे के पेट में प्रज्ज्वलता की अग्नि को अन्नरूपी आहुति न दी जाये तब तक आपकी यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं हो सकती। इसलिए हे धर्मराज युधिष्ठिर! आप धनंजय अर्जुन को भेजकर यह पता लगाओ कि कौन भूखा रह गया है?”
युधिष्ठिर ने कौन भूखा रह गया है, उसका पता लगाने के लिए अर्जुन को सेवकों के साथ रथ में भेजा। गाँव के बाहर नदी के किनारे एक महात्मा भूखे बैठे है। अर्जुन ने उनके पास जाकर हाथ जोड़े कर कहा, प्रभु! मैं धनंजय! धर्मराज युधिष्ठिर का यज्ञ पूर्णाहुति पर अटका हुआ है। मैं आपको भोजन के लिए यज्ञ में पँधारने की प्रार्थना करता हूँ।”
अर्जुन को आशीर्वाद देकर महात्मा ने कहा, धनंजय! मैं कहीं भी प्रसाद लेता नहीं हूँ। मेरा व्रत है कि जो कोई सौ यज्ञ का फल कृष्णार्पेण करे तो उसके यहाँ एक समय का भोजन लेनें जाऊँ।”
बहुत समझाया पर महात्मा नहीं माने। अर्जुन खाली हाथ वापिस आया। सब चिन्ता में पड गयें। श्रीकृष्ण तैयार हुए। उन्होंने कहा, “मैं महात्माजी। को प्रसाद लेने के लिए तैयार कर लूँगा।” द्रौपदी जाने के लिए तैयार हुई। द्रौपदी के लिए रथ आया। द्रौपदी ने कहा, “रथ ले जाओ। मैं संत का दर्शन करने के लिए पैदल जाऊँगी।”
पूजा की सामग्री लेकर सती द्रौपदी संत के पास चलकर गई। संत के चरणों में वंदन करके महात्मा की पूजा की और कहा,”प्रभु मैं द्रौपदी हूँ। हमारा यज्ञ पूर्णाहुति पर अटका हुआ है। आप हमारे यहाँ प्रसाद लेने नहीं पधारोगे?”
महात्मा ने द्रौपदी को आशीर्वाद देते हुए कहा,”मेरा व्रत है कि जो मुझे सौ यज्ञ का पुण्य कृष्णार्पण करे तो उसके यहाँ एक समय का भोजन लेने जाऊँगा।”
द्रौपदी ने कहा, “प्रभु! लो यह जल संकल्प कराओ। मैं आपको सौ यज्ञ का कृष्णार्पण करने के लिए तैयार हूँ।
महात्मा ने कहा, “बेटी! तुम्हारे तो अभी एक ही यज्ञ हुआ है। फिर तू मुझे सौ यज्ञों का फल किस प्रकार देगी?”
द्रौपदी ने कहा, “आपकी बात सही है कि हमने यज्ञ तो एक ही किया है और वो भी अधूरा है। परन्तु मैंने भगवान श्रीकृष्ण के मुख से सुनी है कि सच्चे संत के दर्शन हो जायें तब एक-एक कदम का पुण्य एक-एक यज्ञ के फल के बराबर होता है। मैं यहाँ तक आई तब तक पाँच सौ कदम चल चुकी हूँ। अतः मुझे पाँच सौ यज्ञों का पुण्य दो।”
संत के चेहरे पर स्मित छा गई। संत तुरंत खडे हो गये। द्रौपदी के साथ यज्भूमि पर प्रसाद लेने पधारे। संत ने भोजन किया और दिव्य घंटे की आवाज हुई। यज्ञ की पूर्णाहुति हुई।

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