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वामन द्वादशी व्रत कथा | Vaman Dvadashi Vrat Katha

भादों माह की द्वादशी तिथि को वामन द्वादशी का व्रत किया जाता हैं|औरते इस दिन अपने परिवार की सुख-शांति व धन वैभव बनाऐ रखने के लिए वामन भगवान (विष्‍णु) का व्रत रखते है वेदो, पुराणों व शास्‍त्रो में वामन भगवान को विष्‍णु जी का 5वा अवतार माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन अभिजित मुहूर्त में भगवान श्री विष्णु जी ने वामन के रूप में अवतार लिया था. इस द्वादशी को व्रत रखने वाले स्त्री पुरुष को विष्णु तथा लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए|

वामन भगवान व्रत कथा

त्रेतायुग में बलि नामक राक्षक ने एक बार सभी देवताओ को युद्ध में हराकर स्‍वर्ग पर अपना आधिप्‍तय कर लिया था। इसके बाद वह देवताओ पर तरह-तरह के अत्याचार करने लगा। एक दिन सभी देवगण मिलकर देवमाता (देवताओ की मॉ) अदिति के पास गऐ और अपने ऊपर बीते रहे अत्‍याचारो के बारे में बताया। यह सुनकर देवमाता अपने पति ऋर्षि कश्‍यप के पास गयी और देवताओ की समस्‍या बताई।
महर्षि कश्‍यप ने कहा ‘हे देवी तुम भाद्रपद महीने की शुक्‍लपक्ष की द्वादशी का व्रत करो जिससे प्रसन्‍न होकर भगवान विष्‍णु जी तुम्‍हारी कोख से जन्‍म लेगे, अपने पांचवे अवतारे वामन अवतार के रूप में। देवमाता आदित‍ि ने पति महर्षि कश्‍यप की आज्ञा से विशेष अनुष्‍ठान किया। और फलस्‍वरूप विष्‍णु भगवान ने वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर राजा बलि के यहा आ गए। उस समय राजा बलि ने विशेष यज्ञ का अनुष्‍ठान किया था। और वामन भगवान उसी यज्ञ में जाकर शामिल हो गए।
राजा बलि ने वामन भगवान का भव्‍य स्‍वागत किया और दक्षिणा देने लगे। किन्‍तु वामन भगवान ने मना कर दिया कहा की हे राजन में दक्षिण में कुछ भूमि मांगना चाहता हूँ। क्‍योकि मेरे पास इतनी भूमि नही जहा पर मैं बैठकर भक्ति कर सकू। ब्रह्मचारी की बात सुनकर राजा बोला हे भगवन आप मांगो कितनी भूमि चाहिए।
भगवान विष्‍णु जी की इस माया को राजा बलि के कुल गुरू शुक्राचार्य पहचान गऐ और बलि से दक्षिणा में भूमि देने से मना किया और कहा की यह सब विष्‍णु की माया है। ताकि तुम्‍हे युद्ध में हरा सके। किन्‍तु राजा बलि भक्‍त प्रहृलाद का पोत्र होने के साथ-साथ बडा ही दयावान था। उसके द्वार से कोई खाली हाथ नही गया। राजा बलि ने अपने राज गुरू की बात नही मानी और भूमि देने के लिए तैयार हो गए।
जिसके बाद वामन भगवान ने दक्षिणा के लिए तीन पग भूमि मांगी। राजा ने कहा हे ब्रह्मचारी आपको मेरे इस विशाल राज्‍य में जो स्‍थान अच्‍छा लगे वहा पर आप भूमि ले सकते है। इसके बाद वामन भगवान ने अपना विशाल रूप धारण किया और अपना पैरा उठाया। एक पैर मे ही भगवान ने पूरी पृथ्‍वी, दूसरे पैर मे स्‍वर्ग लोक और ब्रह्मलोक को नाप लिया।
तब वामन भगवान ने कहा हे राजन मैने तीन पग भूमि मांगी थी जिसमे मै दो पग भूमि में सब कुछ नाप लिया किन्‍तु अभी तीसरा पग कहा रखू। तब राजा बलि ने कहा हे भगवान आप तीसरा पैरा मेरे सिर पर रखकर अपनी दक्षिणा को पूरी किजिए। और वामन भगवान ने अपना तीसरा पैर राजा बलि के ऊपर रखकर तीन पग भूमि प्राप्‍त करी।
इसके बाद भगवान अपने असली रूप में आकर राजा बलि से कहा- हे राजन! आज से तुम पाताल लोक के स्‍वामी हो। तुम वहा जाकर राज करो। राजा ने स्‍वीकार करते हुए कहा की हे भगवन आप भी पाताल लोक में सदैव निवास करों त‍ाकि मुझे आपकी पूजा-अर्चना व भक्ति करने का सुख प्राप्‍त हो। वामन भगवान तथास्‍तु कहकर अर्तंध्‍यान हो गए।

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