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त्याग और समर्पण को न भूलें | Tayag Aur Smarpan Ko Na Bhule

भगवान शाम को महल में बैठे थे। सारा राजकुटुम्ब बैठा था। उस समय राम ने कौशल्या माँ के सामने भरत को कहा,”माँ! मैं राजा बना हूँ। इसलिए छोटों को कुछ देना चाहिए न! तो भरत से कहो कि मुझसे कुछ माँगे। भरतजी खडे हुए। राम बोले,”अभिषेक की खुशी में भैया, क्याँ दूँ?”
भरतजी के नेत्रों में आंसू भर आये। भरतजी ने कहा,”कुछ नहीं महाराज! आपके चरणों में प्रेम बढता रहै।”
मांडवी भरत की धर्मपत्नी आई। राम ने कहा,”मांडवीजी! बोलो, आपको क्या दूँ, बेटा?” मांडवीजी ने कहा,’रघुकुल में पुत्रवधू बनने का सदभाग्य मिला। अब माँगने को क्या रह गया? अब कोई इच्छा नहीं।”
लक्ष्मणजी आये। रामजी ने पूछा, “भैया, क्या दूँ?”
“मांगो !”
लक्ष्मणजी बोले,”महाराज! बचपन से साथ रहते आये हैं। इसी तरह जीवन पर्यन्त साथ रखना। कभी अलग मत करना।’
लक्ष्मणजी के धर्मपत्नी आये, उर्मिलाजी। “माँगो !”
उर्मिलाजी ने कहा, “महाराज! कैसी भी परिस्थितियाँ आयें। मेरी धीरज टीकी रहे। मेरी स्थिति मजबूत हो ।”
“तथास्तु ।”
`शत्रुध्न महाराज आये। रामजी ने पूछा,”शत्रुध्न, माँग! क्या दूँ?
उन्होंने भरतजी की सेवा माँगी। निशदिन भरतजी के चरणों मे रति रहे।
पर क्रान्ति तब घटी जब शत्रुध्न की धर्मपत्नी श्रुतकीर्ति माँगने आयी, सब से छोटी। रामजी को प्रणाम करती है। “श्रुतकीर्ति बेटी, माँगो। क्याँ दूँ ?”
श्रुतकीर्ति की आँखे गिली हो गयी। श्रुतकीर्ति ने कहा, “प्रभु, मांगु?”
“हाँ माँगो।”
“जो माँग वो दोगे न?”
‘अवश्य।” श्रुतकीर्तिजी ने मागा: “आप आज पधारे। आपका राज्याभिषेक हुआ। आप जब आये तब स्नान किया। और फिर राज पोशाकें पहनी। प्रभु! चौदह वर्ष के वल्कल जो आपने उतारे है वे वल्कल मझे प्रसादी के रूप में दे दो। आपके वल्कल चाहिएँ ।
“वल्कल?”
“हाँ, प्रभु! रघुकुल में अपवाद है। रघुकुल में कब वनवास आये, पता नहीं। अब जो सुख आया है, उसमें हम भूल न जायें और कल यदि वनवास आया तो हम वह वल्कल देखकर त्याग और समर्पण के सिद्धान्त को भूल न जायें। बस। इसलिए मुझे वल्कल दे दो।”
भगवान राम श्रुतकीर्ति को वल्कल अर्पण करते हैं।

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