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भाग्यशाली | Bhagyashali

चित्रकूट का प्रसंग है। संतो का मत है। लक्ष्मणजी फल-फूल लेने गये थे और राम-सीता बैठे-बैठे चर्चा कर रहे थें। वसन्तऋतु थी और वृक्ष खिला हुआ था। उस पर एक बेल छा गई थी। उस बेल को वृक्ष पर छा गई देखकर सीताजी ने राम को कहा,”आर्यपुत्र, यह लता कितनी भाग्यशाली है, कितने सुन्दर वृक्ष के सहारे छा कर बैठी है?”
रामजी बोले, “नहीं सीता, आप भूल कर रही है। लता से अधिक भाग्यशाली वृक्ष हैं। यह वृक्ष कितना भाग्यशाली है कि ऐसी लता उस पर छा गई है?”
दोनों चर्चा करते हैं। सीता ऐसा कहना चाहती है की मेरे कितने सदभाग्य की मुझे आप की शरण में स्थान मिला। और राम कहना चाहते है की सीता, मेरे कितने सदभाग्य है कि आप जैसी पत्नी मुझे मिली। दोनों अपनी-अपनी बात प्रकृति के माध्यम से कह रहे है। उसी समय लक्ष्मणजी आये।
राम-सीता ने उनसे कहा, “भाई, त निर्णय दे।” दोनों ने अपनी बातें समझाई। तब लक्ष्मणजी कहते है, मुझे ऐसे न्याय में मत डालो।
दोनों ने लक्ष्मणजी को बहुत आग्रह किया तब लक्ष्मणजी ने कहा, “महाराज, आपको और मेरी माँ को बुरा न लगे तो यह कहता हूँ कि न तो वृक्ष भाग्यशाली है और न ही लता भाग्यशाली है ।”
“तो फिर?”
“भाग्यशाली तो यह लखन है की जिसे उसकी छाया में आराम मिलता है।”

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